विश्व परिवार दिवस
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अनुव्रतः पितुः पुत्रो मात्रा भवतु संमनाः ।
जाया पत्ये मधुमतीं वाचं वदतु शन्तिवाम् ॥
अर्थात पिता के प्रति पुत्र निष्ठावान हो । माता के साथ पुत्र एकमन वाला हो। पत्नी पति से मधुर तथा कोमल शब्द बोले । परिवार कुछ लोगों के साथ रहने से नहीं बन जाता । इसमें रिश्तों की एक मज़बूत डोर होती है , सहयोग के अटूट बंधन होते हैं , एक - दूसरे की सुरक्षा के वादे और इरादे होते हैं । हमारा यह फ़र्ज़ है कि इस रिश्ते की गरिमा को बनाए रखें । हमारी संस्कृति में , परंपरा में पारिवारिक एकता पर हमेशा से बल दिया जाता रहा है । परिवार एक संसाधन की तरह होता है । परिवार की कुछ अहम ज़िम्मेदारियां भी होती हैं । इस संसाधन के कई तत्व होते हैं । दूलनदास ने कहा है ,
दूलन यह परिवार सब , नदी नाव संजोग ।
उतरि परे जहं - तहं चले , सबै बटाऊ लोग ।
जैनेन्द्र ने इतस्तत में कहा है , " परिवार मर्यादाओं से बनता है । परस्पर कर्त्तव्य होते हैं , अनुशासन होता है और उस नियत परम्परा में कुछ जनों की इकाई हित के आसपास जुटकर व्यूह में चलती है । उस इकाई के प्रति हर सदस्य अपना आत्मदान करता है , इज़्ज़त ख़ानदान की होती है । हर एक उससे लाभ लेता है और अपना त्याग देता है " ।
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